
तहलका टुडे टीम/सैयद रिजवान मुस्तफा
देवबंद,भारत में हाल ही में पीएम नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा ‘बटोगे तो कटोगे’ के ऐलान ने न केवल देश के भीतर बल्कि वैश्विक स्तर पर भी गूंज उठी है। यह बयान भारत की एकता और सांस्कृतिक अखंडता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसी क्रम में, दारुल उलूम देवबंद में ईरानी उलेमाओं के प्रतिनिधिमंडल का जोरदार स्वागत हुआ, जहां सभ्यता और सांस्कृतिक एकता पर गहन चर्चा हुई।
इस दौरान इस्लामी ज्ञान और परंपरा का आदान-प्रदान हुआ, जो दर्शाता है कि भारतीय समाज की विविधता में एकता का कितना महत्वपूर्ण स्थान है। वहीं, सूत्रों के मुताबिक भारत को आपसी फूट डालकर गुलाम बनाने का सपना देख रहे इजराइल अमेरिका के होश उड़ गए है।
इस्लामी गणराज्य ईरान की मशहूर दीन-शिक्षण संस्था अदयान यूनिवर्सिटी (क़ुम) से जुड़े 13 सदस्यीय उलेमा और शोधकर्ताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने विश्व प्रसिद्ध धार्मिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम देवबंद का दौरा किया। इस दौरे का उद्देश्य दोनों देशों के धार्मिक और शैक्षणिक संबंधों को मज़बूत करना और इस्लामी ज्ञान के प्रसार पर विचार-विमर्श करना था।

प्रतिनिधिमंडल का जोरदार स्वागत दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम (प्रधान) मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नुमानी और संस्थान के प्रमुख और देश की जानी मानी शख्सियत मौलाना सैयद अरशद मदनी ने किया। इस दौरान इस्लामी शिक्षा, ज्ञान और दुनिया में इसके प्रसार पर विस्तृत चर्चा हुई।
दारुल उलूम के जिम्मेदारों ने ईरानी उलेमाओं को इस संस्थान की सुनहरी सेवाओं और इसकी गौरवशाली इतिहास के बारे में जानकारी दी। इसके बाद उन्हें दारुल उलूम के दुर्लभ पुस्तकालय, ऐतिहासिक नुदरा कक्ष, भव्य दारुल हदीस, जामे मस्जिद रशीद और शेख-उल-हिंद लाइब्रेरी का दौरा कराया गया। इस अवसर पर अदयान यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर अबुल हसन नवाब और प्रोफेसर हसन नूरी ने दारुल उलूम की पुरानी और ऐतिहासिक इमारतों को देखकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।
वहीं, प्रोफेसर अहमद मबलगी ने दारुल उलूम देवबंद की भूमिका की सराहना करते हुए कहा, “दारुल उलूम देवबंद इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार और खासतौर पर इस्लामी ज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यहाँ के बुजुर्गों का ज्ञान पूरी दुनिया में फैल रहा है।” उन्होंने कहा कि देवबंद की ऐतिहासिक इमारतें इसके संस्थापकों की ईमानदारी और अल्लाह से जुड़ाव को दर्शाती हैं।
इस दौरान नई दिल्ली स्थित ईरानी कल्चरल हाउस के काउंसलर डॉक्टर फरीदुद्दीन और सैयद सादिक हुसैनी ने प्रतिनिधिमंडल की तरफ से संवाद का कार्य संभाला। बातचीत के दौरान, मौलाना नुमानी और मौलाना मदनी ने ईरानी उलेमाओं के साथ धार्मिक और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की।
भारत में ईरानी दूतावास के प्रवक्ता सैयद सादिक हुसैनी ने बताया कि दारुल उलूम देवबंद के दौरे से ईरानी प्रतिनिधिमंडल बहुत ही संतुष्ट होकर वापस लौटा है। उन्होंने कहा, “दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम और मुख्य शिक्षक ने ईरानी उलेमाओं का गर्मजोशी से स्वागत किया और हमें सौहार्दपूर्ण वातावरण में बातचीत का अवसर मिला। हमने ईरान की ओर से मौलाना अरशद मदनी को ईरान के सांस्कृतिक दौरे के लिए आमंत्रित किया।”
सैयद सादिक हुसैनी ने कहा कि “राष्ट्र की एकता और आपसी समझ को बढ़ाने के लिए इस तरह के वार्तालाप और मुलाकातें बहुत ही ज़रूरी हैं। यह दौरा भारत और ईरान के बीच धार्मिक और शैक्षिक संबंधों को और मज़बूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।”
दारुल उलूम देवबंद का यह दौरा दोनों देशों के बीच रिश्तों में नई कड़ी जोड़ने का काम करेगा।
सैयद सादिक हुसैनी ने कहा कि इस तरह की बैठकों से आपसी विश्वास और समझ को बढ़ावा मिलता है। धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर एक-दूसरे से सीखना और संवाद करना बहुत जरूरी है, खासकर इस्लामी दुनिया में एकता को बढ़ावा देने के लिए। उन्होंने कहा कि ईरानी उलेमा ने दारुल उलूम की शिक्षा प्रणाली और इसकी ऐतिहासिक विरासत की तारीफ की और इसे इस्लामी दुनिया में एक उदाहरण बताया।
मौलाना अरशद मदनी ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि ऐसे दौरों से आपसी शिक्षा और संस्कृति का आदान-प्रदान होता है।
उन्होंने कहा कि दारुल उलूम देवबंद हमेशा से इस्लामी एकता और सौहार्द के लिए काम करता रहा है और इस दौरे से दोनों देशों के बीच सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे। मौलाना नुमानी ने भी इस दौरे को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इस तरह के संवाद और विचार-विमर्श से इस्लामी शिक्षा के प्रति नई दृष्टि विकसित करने में मदद मिलती है।
ईरानी प्रतिनिधिमंडल की इस यात्रा का महत्व इसलिए भी खास है कि इसमें दोनों देशों के सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की गई।
प्रतिनिधिमंडल ने दारुल उलूम देवबंद के छात्रों और शिक्षकों के साथ भी समय बिताया और इस्लामी शिक्षा के बारे में अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि ऐसे अवसर भविष्य में और भी अधिक सहयोग के लिए मार्ग प्रशस्त करेंगे।
अंत में, सैयद सादिक हुसैनी ने कहा कि यह दौरा एक नई शुरुआत का प्रतीक है।उन्होंने आशा जताई कि आने वाले समय में भारत और ईरान के बीच धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध और मजबूत होंगे। दोनों देशों के बीच इस तरह के संवाद न सिर्फ धार्मिक संस्थाओं बल्कि आम जनता के बीच भी भाईचारे और समझ को बढ़ावा देंगे।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि भारत का यह कदम न केवल आंतरिक एकता को सुदृढ़ करेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भी एक सकारात्मक संदेश भेजेगा। सभी धर्मों और संस्कृतियों को एक साथ लाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण पहल है, जो इस्लामी ज्ञान और भारत की सांस्कृतिक धरोहर को और भी मजबूत बनाएगी।